बस एक साल बाद (My JEE journey)

भाग 1

“हेलो! राघव बेटा, अभी तुम्हारा रिजल्ट नही आया?”
“जी, ताऊ जी! अभी साईट नहीं खुल रही पता चलते बताता हूँ”
“ठीक है बेटा जल्दी बताना”
“जी ताऊ जी”

पिछली एक दो कॉल्स की तरह इस कॉल पर भी राघव ने झूठ बोला, रिजल्ट तो पता चल गया था; 123 नम्बर थे 360 में कट ऑफ 100 गया था; इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में; अरे वही अपने Jee Main में।
राघव ख्यालों में डूबा खुद से बातें करने लगा –
“लोग क्या कहेंगे-
‘अरे लड़के बाहर जाकर बिगड़ जाते हैं’
‘लड़का अच्छा था बस संगत गलत हो गई होगी’
‘बेचारा मेहनती था अब किस्मत को नहीं मंजूर तो क्या करें’
नहीं शायद ये तीसरी वाली बात कोई नहीं कहेगा सब ताने ही मारेंगे;
पापा के दोस्त अवस्थी अंकल की बेटी NIT BHOPAL में है ना। शायद पापा ने सोचा हो कि मुझे NIT BHOPAL से अच्छा कॉलेज मिलेगा। कहीं पापा  शर्मिंदा तो नहीं होंगे मेरी वजह से।”

इसी तरह के विचारों में तैरते हुए राघव के दिमाग में अचानक एक साल पहले का फ़्लैशबैक चलने लगा।

कितने प्यार से उसे मम्मी पापा कोटा छोड़कर आये थे बहुत उम्मीदें थीं।
“स्मार्टफोन मत दीजियेगा दिन भर fb चलाएगा मैं जानती हूँ”- मम्मी ने कहा था।
पर अब राघव ऐसा नहीं है वो पढ़ेगा पूरे एक साल, राघव ने सोचा था।

हमारे यहाँ बिटिया का ससुराल जाना और PCM के अच्छे समझे जाने वाले छात्र का कोटा-कानपुर जाना तय होता है। ये हमारी परम्परा है जो संस्कृति बन रही है।

उसने मेहनत की पहले 12 से 6 सोता था, फिर और पढ़ाई की जरूरत हुई तो 1 से 6 फिर 1:30 से 6 दिसम्बर जनवरी में हद हो गई 2 से 6 सुबह 7 से 1 की कोचिंग फिर 1 घंटे आराम फिर युद्ध की तैयारी में जुट जाना, लेकिन हर बार एक ही बात जो उसको उफ़्फ़ तक नही करने देती बस एक साल बाद

भाग 2

“नाश्ता आ गया ले लो”- हॉस्टल वार्डन ने दरवाजा खोलते हुए कहा।
राघव ने हवा में बिखरी उन तस्वीरों को आँखों के लिफ़ाफ़े में बंद किया और लिफ़ाफ़े से दो मोती कदमों में गिरकर बिखर गये।
राघव चाय ले आया मुंह तक ले जाने का मन नहीं किया।
“आई डिड माय बेस्ट”- राघव ने किसी अदृश्य से कहा।
“तुम तो सब जानते हो जब सारे दोस्त मोबाइल पर फिल्म देखते थे तो मैं कहता था बस एक साल बाद; जब सब शाम को घूमने निकल जाते थे तो मैं कहता था बस एक साल बाद; और…..और….मैनें स्मृति से भी यही बोला था अगर हो सके तो बस एक साल बाद।
तुम तो सब जानते हो ना तुम जाकर सबसे क्यों नहीं कहते।”
वो अदृश्य शक्ति बुत बनी खड़ी रही।
स्मृति राघव की बहुत अच्छी दोस्त, जिससे वो घंटों चैट किया करता था; पर कभी तथाकथित रूप से गर्लफ्रेंड कहने की हिम्मत नहीं कर पाया था। पर वो जानता था ‘SHE IS SOMETHING MORE THAN JUST A FRIEND’.

जब हॉस्टल में दूसरे लड़के अपनी गर्लफ्रेंड से बतियाते थे तो एक तस्वीर उसकी आँखों में भी चमक जाती थी जो उसकी पढ़ाई को और तेज़ कर देती थी।
“स्मृति से मेरी पढ़ाई डिस्टर्ब होती थी, इसीलिए उसे कांटेक्ट नहीं किया FB भी नहीं चलाई पूरे एक साल कितना कुछ किये हुए एक साल हो गया। हां, पूरा एक साल”।
राघव पागलों जैसा खुद से बात करता रहा।
अक्सर स्ट्रेस कम करने के लिए राघव अपनी हॉस्टल की बालकनी में डिनर के बाद कुछ देर खड़े होकर गप्पे हांक लिया करता था। “लेकिन 7:30 से 8:30 की इस आराम अवधि का मतलब ये तो नहीं की मैंने मेहनत नहीं की…”- राघव ने अपनी ही  अदालत में अपना पक्ष रखा।
“…और आज एक साल बाद क्या मिला ये मुट्ठीभर नंबर जिनको लेकर शायद ही किसी NIT में एडमिशन मिले जो साल भर मस्ती करते रहे उनको भी 70-80 नंबर मिले। उनमें और मुझमें अंतर ही कितना है 30-40 नंबर का। साल भर की सिन्सियारटी की क्या इतनी ही कीमत है?…”
राघव अब गुस्से में था ..
“मेरी गलती ही क्या थी क्लास 10 में 9.6 CGPA या बारहवीं में 91-92% नंबर? क्या ये तीन अंक या वो तीन घंटे मेरी लाइफ़ डिसाइड कर देंगे? किसने दिया इनको ये अधिकार मैंने तो नहीं दिया?”
अब राघव कुछ शांत हुआ।

भाग 3capture

ख्यालों की हवा लगकर ठंडी हो चुकी चाय की एक चुस्की ली राघव ने।

“जहर है ये ! इतनी कडवी, अदरक डाली है या जहर”- राघव झल्लाया

“जहर हाँ, ये ठीक है मैं जहर खाकर आत्महत्या कर लेता हूँ; अखबार में पढ़ा है कि जिसके नंबर कम आते हैं वो सुसाइड कर लेते हैं। न किसी के ताने का डर न किसी से नजरे मिलाने का डर।”
राघव की अदालत में राघव को सजा -ए- मौत मिली।
“जहर लेकिन है कहाँ?”
“अरे ये ALLOUT वाले LIQUID की डब्बी है ना”
राघव का दिमाग एक IITian की तरह से चलने लगा। जैसे अक्सर वो CALCULUS के कठिन सवाल चुटकी बजाते ही SOLVE कर देता था।

अब राघव की जिंदगी और मौत में केवल उस डिब्बी के खुलने की देर थी।……..

डिब्बी खुली………
.
…….लेकिन जमीन पर जोर से पटकने की वजह से….
“किसने बना दिया है JEE MAIN
-CBSE वालों को मेरा भाग्यविधाता ? क्यों मैं मर जाऊं अगर MAINS में स्कोर अच्छा नहीं है तो?
शायद ये राघव के माता पिता के शुभकर्म थे।(राघव जिन्दा था)

राघव जैसे विद्रोह पर उतर आया…..
“क्या करते हैं IIT के ENGINEERS पता है आपको?……”
वो अदृश्यशक्ति फिर से आ गयी थी; राघव उस पर चिल्लाया।
“अरे मैं बताता हूँ, जिनको करोड़ों का पैकेज मिलता है। वो मल्टीनेशनल कम्पनीज में चले जाते हैं। कितने इंजीनियरिंग छोड़ कर साधू-महात्मा, कवि, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, टीचर बन जाते हैं।
……और कुछ खोल लेते हैं कोचिंग इंस्टिट्यूट …..
…MR. XYZ FROM IIT KHARAGPUR …..”
“और शुरू हो जाती है एक दुकान जहाँ सपने बिकते हैं। जी हाँ एक दो लाख रूपए दीजिये और खरीद लीजिये एक सपना IIT में जाने का सपना।
जी हाँ एक दुकान जहाँ सपने बिकते हैं। इस दुकान में पैसे हैं, इज्ज़त है, अपनी मर्ज़ी के मालिक।

 

भाग 4

IIT एक चैलेंज है या फिर पैसा कमाने का सीधा सा जरिया ।
यानी सारी बात पैसे की है पैसा …बहुत पैसा…
तो मैं कमाऊँगा ना पैसा – इज्ज़त
…बहुत पैसा – बहुत इज्ज़त….”

“….पैसे और इज्ज़त के लिए IITian होना जरूरी नहीं।
कितने IITians को जानते हैं आप जो सक्सेस हैं पॉपुलर हैं 10-20 को जानते होंगे अरे 50 को जानते होंगे। मैं 500 गिना सकता हूँ; IITian नहीं है मगर सुपरहिट है, बहुत खुश हैं।
प्रधानमन्त्री मोदी IITian नहीं पर PM हैं, केजरीवाल IITian हैं पर CM ही हैं।
सक्सेस के लिए IIT का ठप्पा लगना जरूरी नहीं।
मैं क्यों पियूँ ये जहर ये जहर आज देश की शिक्षा व्यवस्था में है। मैं निकाल दूंगा ये जहर लोगों की सोच से भी निकाल दूँगा।

जब लेखक बनना है तो IIT क्यों? जो गा अच्छा लेता है वो इंजीनियरिंग क्यों करें? जो पॉलिटिक्स में जाना चाहता है वो IIT की कोचिंग क्यों करे?
मैं बताता हूँ ये कोचिंग संस्थान क्यों खुले हैं ये “LATENT CORRUPTION” है, “गुप्त भ्रष्टाचार”
कक्षा 10 तक कोई पढ़ाई नहीं होती। कक्षा 11-12 में थोडा बहुत पन्ने पलटे की आ गये 90-95% नंबर। और फिर JEE MAIN में यही 90-95% वाले 200 के नीचे सिमट गये।
गलती कहाँ है ?
गलती हमारी सोच में है। मैं सुधारूँगा ये गलती।
जिससे की हमारे देश के शिक्षण संस्थान इंजिनियर डॉक्टर छापने की फैक्ट्री ना बनें। हम इतिहासकार बनाएं, हम शिक्षाविद, साहित्यकार बनाएं, हम वैज्ञानिक बनाएँ।
आज हम इन क्षेत्रों में कितना कर पाए हैं। अरे पैसा ही नहीं है यहाँ।
इन क्षेत्रों में शायद दो या तीन नोबल प्राइज मिले हैं।
अफ़सोस इंजीनियरिंग डॉक्टरी के लिए नोबल नहीं मिलता।
और इस एजुकेशन सिस्टम में हमेशा हम मिडिल क्लास वाले फंसते हैं –
I MEAN हम AVERAGE बच्चे हम एवरेज बच्चे फंसते हैं ‘TOPPERS ARE ALWAYS TOPPERS ऊपर वाले ऊपर से नीचे वाले नीचे से’।
आज देश में IIT MEDICAL IIM के अलावा कुछ दिखता ही नहीं ।
ये कौन बदलेगा?
मैं बदलूँगा मैं चुपचाप ये नहीं देख सकता कि कोई जहर खा ले क्योंकि वो पढने में अच्छा नहीं।”

शायद राघव आज सचमुच पढ़ लिख गया था।
शिक्षा का मुख्य उद्देश्य आज पूरा हो गया था।
एक जान बच गई।
एक परिवार की खुशियाँ बच गईं ।
और राघव को अपने जीवन का लक्ष्य मिल गया था।
.
.
क्या आपको अपने जीवन का मतलब पता है या बस…………….

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