ठाकुरत्व और प्रेम तत्व

FB पर बड़े गर्व से अपने ठाकुर होने का अहसास देती हुयी मूछों पर ताव देने वाली फ़ोटो खींच कर डालते थे, हमारे

ठाकुर संग्राम सिंह सूर्यवंशी

18 की उम्र थी ठाकुर साहेब की और LLB कर रहे थे।

ठाकुर साहिब की एक बात और प्रासंगिक थी कि लड़कियों से कुछ उखड़े उखड़े रहते थे। शायद इसे अपना शगल कहते थे।

पर दिल का क्या करें साहिब?

एक दिन मित्रता हो गयी नम्रता जी से FB पर ही। इत्तेफ़ाकन दोनों एक ही विद्यालय के पुराने छात्र निकले, हाँ स्कूल के दिनों में ठाकुर साहिब उससे एक कक्षा पीछे थे।
पर वर्तमान में दोनों स्नातक के प्रथम वर्ष में थे।
सो जल्दी ही जान पहचान हो गयी।

ठाकुर साहेब अपनी तन्हाई में खोये LLB की मोटी मोटी कानूनी किताबों में उलझे रहते थे।

खैर ठाकुर साहिब दिमाग से तो नम्रता जी को अपना बहुत अच्छा दोस्त मानते थे, पर कहीं कहीं कुछ कुछ होता है वाली फीलिंग भी थी।

बस नम्रता जी अपनी जीवन में व्यस्त FB पर समय नहीं बिता पाती थीं।

सो एक दिन ठाकुर साहिब हिम्मत करके नम्बर माँग ही लिए। कुछ अजीब सा था उस लड़की में नम्रता नाम जैसी ही नम्र थी।

न्यूटन का तीसरा नियम लागू हुआ और दोनों तरफ से बराबर की फ़ोर्स लगी।

खैर अब ठाकुर जी घर में पहले जैसे गुमसुम नही रहते थे। बहुत खुश थे अब तो फोन पर बात होती थी। हाँ नम्रता ने कई बार व्हाट्सएप्प पर आने में मजबूरी जताई।

फिर भी हमारे ठाकुर साहिब सब ठीक मानते थे।
आज 2 महीने हो चुके थे उस पल को जब पहली बार नम्रता से बात की थी ठाकुर साहेब ने।

और अब ठाकुर साहेब पूरा बदल चुके थे।

कहते हैं कि सब कुछ अच्छा चलता रहेगा तो भगवान को कौन पूछेगा सो एक दिन बड़ी विडम्बना हुयी।

ठाकुर जी के पास एक बालिका की फ्रेंड रिक्वेस्ट आई FB पर।
ठाकुर साहेब अपने चिर परिचित अंदाज़ में बोले
“मोहतरमा आप कौन”
उधर से जवाब आया
“कुछ नहीं आपकी प्रोफाइल देखी तो पता चला आपने CLAT की परीक्षा पास की है।”
ठाकुर साहेब की मूछें और तन गयीं
“जी हाँ तो……..”
“कुछ नहीं आपसे इसके बारे में कुछ पूछना था”

ठाकुर साहेब ने तब तक बालिका की प्रोफाइल चेक की तो पता चला कि सलोनी नाम की ये बालिका ST. THERASES से पढ़ी थी कक्षा 12 तक।
ये विद्यालय ठाकुर साहेब के विद्यालय के पड़ोस में था।

ठाकुर साहिब की बाँछे खिल गयीं बालिका की फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वयं आयी थी।

नम्रता और सलोनी

धीरे धीरे सलोनी से FB पर खूब बातें किया करते थे।

सलोनी और ठाकुर जी में खूब जमने लगी।

उधर नम्रता और ठाकुर जी कुछ और ही तरीके की बातें करने लगे थे।
एक दिन नम्रता ने बड़ी ही विनम्रता से

थोड़ा लजाते हुए

थोड़ा शरमाते हुए

ठाकुर साहेब से दिल की बात कह ही दी ।
ठाकुर साहेब ने तो कभी ऐसा सोचा ही नहीं था। पर दिल में कुछ तो था।

पर प्रेमिका का प्रणय निवेदन सुनकर उनके अंदर का मनुष्य जाग उठा और उन्होंने भी प्रपोज़ कर दिया।

ठाकुर साहेब की जिंदगी में प्रेम उस बारिश की तरह था धूप में होने लगती है।

ठाकुर साहेब की मूछों के दोनों किनारे अब एक दुसरे से शर्माने लगे थे।

ठाकुर साहेब अब सबसे छुपने लगे थे।
फिर भी ठाकुर साहेब की मूँछो में आत्मविश्वास और बढ़ गया था।

उधर सलोनी से बात शुरू किये हुए 27 दिन हो चुके थे इत्तेफ़ाकन 1 अप्रैल को ही ये चूतियापा शुरू हुआ था।

खैर वही होता है अगर बिना किसी रिश्ते के, इस कच्ची उम्र में लड़का लड़की हद से ज्यादा बातें करने लगें तो उन्हें लगने लगता है कि प्यार हो गया।

मनोवैज्ञानिक रूप से एक प्रकार का आकर्षण होता है जो इस उम्र में विपरीत लिंगियों के प्रति हो ही जाता है।
पर अभी तक इसकी वजह समझ नहीं किसी एक के प्रति ही क्यों होता है?

खैर कहानी पर आते हैं आज 29 अप्रैल था सलोनी से बात करते हुए ठाकुर साहेब अब समझ रहे थे कि उनके और सलोनी के बीच सामान्य मित्रता का सम्बन्ध मात्र नहीं है, परंतु यदि कुछ और है तो ठाकुर साहेब उसे स्वीकार नहीं करना चाहते थे।
ठाकुर साहेब यह स्वीकार नहीं कर पा रहे थे कि वो सलोनी से प्यार करते हैं।
पर धोखेबाज नहीं थे इसलिए सब कुछ साफ़ करना चाहते थे।

वे सलोनी को अच्छा दोस्त समझते थे। उनके दिल के कोर्ट में उनकी अपनी दलीलें थीं।

अब ठाकुर साहब खुद को मँझधार में अटका हुआ पा रहे थे।
ये फैसला ही नहीं कर पा रहे थे कि जब वो प्यार नम्रता से करते हैं।
तो फिर ये सलोनी से क्या रिश्ता है।
अब उनकी सारी वकालत उनका साथ छोड़ चुकी थी।

हारकर उन्होंने कोर्ट में सच बोलने का फैसला लिया।

आज 30 अप्रैल थी
सलोनी ने कुछ फोटोज भेजीं और पूछा इनमे से सबसे अच्छी टी शर्ट कौन सी है
ठाकुर साहब ने एक चुनी
सलोनी ख़ुशी से बोली हमारी पसंद कितनी मिलती जुलती है
ठाकुर साहब ने एक स्माइली भेज दी
सलोनी बोली कि “हम तुम ठाकुर ठाकुर तभी सोच इतनी मिलती जुलती है हाँ शायद और भी कुछ है।’
ठाकुर साहब ने बस इतना ही बोला
“सलोनी, I LOVE NAMRTA”

और उसके बाद जो हुआ वो ठाकुर साहेब ने सोचा भी नहीं था सलोनी बोली
“शायद मैं भी तुमसे प्यार करती थी”
ठाकुर साहेब को कुछ समझ नहीं आ रहा था फिर भी बोले
“I LOVE U BUT AS A FRIEND”
.
“ये डायलाग लड़कियों पर ही अच्छा लगता है”

“पर सलोनी मैं तुम्हें बहुत अच्छा दोस्त मानता हूँ और नम्रता से मैं प्यार करता हूँ”
.
सलोनी कुछ नहीं बोली बस एक मेसेज आया
“GOING TO DEACTIVATE MY FB ACCOUNT”

ठाकुर साहेब को एक अच्छा दोस्त जाते हुए दिखाई दिया उन्होंने पिछले एक महीने की दोस्ती की दुहाई देते हुए बोला

“कम से कम मुझे दोस्त समझती रहना कभी मौका मिला तो मिलूँगा, तुम्हारे हाथ की चाय उधार है, हाँ तुम जा रही हो तो रोकूँगा नहीं”

सलोनी ने लिखा-” तुम्हारे जैसा कोई नहीं मिला मगर गम है कि तुम भी नहीं मिले। संग्राम मैं सब कुछ छोड़कर तुम्हारे पास आई थी। तुमसे फालतू में इतनी ही बातें नहीं करती थी। हमारी सोच भी एक जैसी थी।”
.
ठाकुर साहब बोले-“क्या हम दोस्त बनकर हमेशा साथ नहीं रह सकते”
सलोनी-“नहीं मुझे हमेशा जलन होती रहेगी कि तुम किसी और के हो। so plz let me go”

फिर ठाकुर साहब चुप हो गए शायद वे सलोनी की भावनाओं को समझ रहे थे
फिर उनके अंदर से आवाज आई
“अरे ठाकुर साहब एक लड़की के लिए इतना गिड़गिड़ा रहे हैं”
दूसरी आवाज बोली

“लड़की नहीं अच्छी दोस्त थी ऐसे दोस्त मिलते नहीं”

“पर ठाकुर कुछ तो मूछों की लाज रखो इतना भीख माँग रहे हो कि वो दोस्ती न तोड़े। ऐसा क्या है उसमे ?”

“पर ये भी तो है – रूठे सुजन मनाइये जो रूठे सौ बार यानि अच्छे लोगों को रूठने पर मना लिया जाता है”

पर ठाकुर साहेब की हर कोशिश बेकार हुयी और उस एकतरफा प्यार ने FB पर एक अकाउंट और डीएक्टिवेट करवा दिया।

नम्बर था सलोनी का पर अब बात करने का मन नहीं था। पर हाँ कहीं न कहीं कुछ प्यार बाकी था, दोस्त वाला प्यार।

जाते जाते सलोनी इतना जरूर कह गयी थी कि ठाकुर साहेब ने अच्छा नहीं किया।
शायद कहीं कोई बददुआ दे गयी थी।

खैर अब ठाकुर साहब ने नम्रता से सारा किस्सा कह सुनाया।
थोड़ी नोंक झोंक के बाद नम्रता मान गयी अब अब सामान्य चल रहा था।

और एक दिन सलोनी की बद दुआ लग गयी

एक दिन ठाकुर साहेब को कुछ ऐसा पता चला कि उनकी मूछें अब नीचे हो गयीं

नम्रता नीची जाति की लड़की थी

क्या प्यार करने से पहले पूछा जाये कि आप अपनी जाति बताइये तभी प्यार होगा।

ठाकुर साहेब जानते थे कि जब वो खुद अपने ठाकुर होने पर इतना गर्व करते हैं।
तो उनके परिवार वाले और समाज क्या कहेगा- ठाकुर साहेब को एक शूद्र से प्यार हो गया।

इतिहास गवाह है यह कोई नई बात नहीं
पाराशर(ब्राह्मण) और सत्यवती (मत्स्यकन्या, वेद व्यास जी की माँ)
शान्तनु (क्षत्रिय) और सत्यवती (मत्स्यकन्या, भीष्म पितामह की माँ)

पर ठाकुर साहेब मान नहीं पा रहे थे
आखिर सभी द्वंदों में
कभी प्रेमी जैसा सोचते
कभी ठाकुर जैसा
फिर अगर ठाकुर साहेब मान भी जाएँ तो बड़े ठाकुर साहेब गोली मार देंगे
माता पिता के विरुद्ध नहीं जा पाएँगे ठाकुर साहेब

एक विचार और था “क्या यार सलोनी तो थी अपनी ही caste की”

आखिरकार ठाकुर साहब का प्रेम तत्व उनके ठाकुरत्व के आगे झुक गया और उन्होंने नम्रता को सब कह सुनाया।

नम्रता ने बस इतना कहा कि चाहने से तो बहुत कुछ हो जाता है फिर भी जैसा तुम ठीक समझो।

ठाकुर साहेब चुप रहे

आखिरकार दो लड़कियों का दिल तोड़ने के बाद ठाकुर साहब अपने पक्ष में कोई गवाह न ढूँढ़ पाये।

उनका दिल बिखर चुका था

बस उनकी मूँछे अभी भी तनी हुईं थीं

आखिरी बार ठाकुर साहेब ने FB अकाउंट खोला और सारी पोस्ट्स डिलीट की जिनमें वो गर्व से कहते थे कि ठाकुर हैं।

ठाकुर साहेब के फ्रेंड्स 489 से 487 हो गए थे।

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