पूर्वी

पूर्वी एक मिडिल क्लास घर की प्यारी सी लड़की जो बनारस की गलियों में बड़ी हुयी थी।
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नहीं प्रेम कहानी नहीं है…
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पूर्वी बनारस के कम मशहूर SMS कॉलेज में पढ़ती थी मैनेजमेंट से स्नातक।
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पूर्वी के अपने सपने थे अपनी ख्वाहिशें, उसे कुछ बनना था। कम्युनिकेशन स्किल अच्छा था और स्कूल टाइम से ही अच्छी मेनेजर थी। बिज़नेस में इंटरेस्ट। सो मैडम BBA कर रही थीं।
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जैसे कि आज कल की मध्यम वर्गीय लड़कियाँ होती हैं, वैसे ही ये मोहतरमा भी बहुत ज्यादा सोशल तो नहीं रहती थीं।
लेकिन हाँ कान में मशीन लगी रहती थी। कभी कभार गाने सुन लेना या फिर अपने (मित्र+कुछ ज्यादा) से बतिया लेना। आदर्श नाम था उसका, बहुत ख्याल रखता था पूर्वी का।
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पूर्वी की एक छोटी बहन थी आस्था साइंस की पढ़ाई में पूर्वी से कहीं ज्यादा अच्छी थी।
इसी आधार पर पूर्वी से एक अप्रत्यक्ष भेदभाव होता था……….. जो होता इतना ज्यादा नहीं था जितना कि उसे महसूस होता था। खैर माँ-बाप भला कब बच्चों में अंतर करते हैं (जब तक कि वो कमाने न लगें)।
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यही वजह थी कि पूर्वी सबके साथ रहकर भी घर से कुछ अलग अलग सी रहती थी। पर हाँ प्यार बहुत करती थी मम्मी पापा से।
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उसकी एक ही समस्या थी अक्सर मिलने वाले मम्मी के ताने। ज्यादा देर रात तक मोबाइल चलाते देख ले तो शुरू हो जाती थीं। अगर छोटी बहन बोल दे कि आज कॉलेज के किसी लड़के से FB पर बात कर रही थी तो 2 दिन तक घर में मातम का सा माहौल रहता था।
एक दिन तो कॉलेज के सब दोस्त 4-5 लड़कियाँ और 6-7 लड़के गोलगप्पे खा रहे थे। पापा ने देख लिया था कितना सुनना पड़ा था उसे।
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हॉस्टल की लड़कियों सरीखी आजादी नहीं मिल पाती घर में रहने वाली लड़कियों को।
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एक दिन अस्सी घाट पर कॉलेज की सहेलियों के साथ बैठी थी।
स्नेहा से बोली
“आदर्श मुझे कितना समझता है। मैं उससे हर बात शेयर करती हूँ। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि घर में कोई अपना है ही नहीं। प्यार व्यार नहीं है उससे पर हाँ अच्छे दोस्त कहाँ मिलते हैं। जिनसे हम अपनी परेशानी कह सकें। बस तुम और आदर्श दो ही लोग मुझे समझते हो।”
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कहानी खत्म
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ये कहानी अकेले पूर्वी की नहीं है बहुत सारी लड़कियों की है।
दो बातें हैं जरा ध्यान से सोचें
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1. माँ इतना क्यों चिल्लाती है कॉलेज के दोस्त ही तो हैं? उनके साथ घूमना खाना पीना गलत तो नहीं?
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2. पूर्वी अपने घर से ज्यादा अपने दोस्तों के साथ रहना पसंद करती है। और कॉलेज के बाद भी FB आदि माध्यमों से उनसे जुडी रहती है।
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माँ चिल्लाती नहीं है, डरती है।
डरती है एक समाज से, कलियुग से नहीं डरती। पाराशर जैसे मुनियों से डरती है।
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कहाँ से लाये वो खुली सोच, जब समाज के कुछ असामाजिक वर्ग के दिमाग में शौचालय बने हैं।
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पूर्वी समाज के उस वर्ग से आती है जो आधुनिक तो होना चाहते हैं, लेकिन रूढ़ियों से इसलिए चिपके हुए हैं, क्योंकि वो जो अपने आस पास होता है वो उसे नज़रन्दाज़ नहीं कर सकते।
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दूध की जली बिल्ली छाछ भी फूंककर पीती है।
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वो कहते हैं न आप चाहे जितनी नकल कर लें मानसिकता नहीं बदलती।
हम पाश्चात्य की नकल कर के छोटे आकर्षक कपड़े पहना सीख गए।
पर वो सोच नहीं बदल पाये, वो भावनायें नहीं बदल पाये जो आकर्षक छोटे कपड़ों को देखकर आती है।
वहाँ की जैसी संस्कृति लाना चाहते हैं।
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पर अभी हमारे समाज में पश्चिम की जैसे रिश्ते सस्ते नहीं हैं।
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हमारे यहाँ वह समय आने में 50 साल का वक़्त लगेगा जब एक लड़के के 4 पापा होंगे।
पर आयेगा जरूर।
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हम आधुनिक तो हों अच्छा है पर एक आधुनिक स्वच्छ सोच भी अपनाएँ।
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दूसरी बात आखिर माँ बाप अपने बच्चों को इतना अकेला क्यों छोड़ देते हैं, कि उन्हें चार दिन के फेसबुकिया फ्रेंड ज्यादा अच्छे लगने लगते हैं।
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क्यों वो उनसे एक मैत्री पूर्ण व्यवहार नहीं करते…….. जिसकी कि घर के बच्चे एक कमी को महसूस करते हैं।
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हर रिश्ते को समय और समझ चाहिए।
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यदि आप व्यस्तता के चलते ये दोनों नहीं दे पायेंगे तो आपका रिश्ता अर्थहीन हो जायेगा।
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और फिर वो इंसान किसी को ढूँढेगा जिससे वो हर बात कह पाये।
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अब अगर आदर्श, आदर्श संस्कारी लड़का है तो अच्छी बात।
अन्यथा भाग्य की इच्छा।
आपकी इच्छा।
मुझसे क्या

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