बिखरने के लिये…

लड़कियों से कम नहीं होती लड़कों की दिक्कतें. हाँ, पर लड़कियों जैसी नहीं होती लड़कों की दिक्कतें. जिस्म को छुपाना नहीं होता, उतना समाज की अतार्किक पाबंदियाँ भी नहीं होतीं. लड़के रो नहीं सकते, क्यों? लिंग के आधार पर, भावनाएँ बँट गयीं क्या? लड़कों की मुस्कुराहट उतनी दिलकश नहीं होती. दर्द भी तो नहीं दिखता, […]

लम्हा…

हम कभी साथ हों न हों पर कुछ तो रहेगा दरमियाँ कल हमें याद आयेगा साथ गुज़रा वो हर लमहा लम्हे जहाँ साथ हम साथ तुम लम्हे जहाँ तेरी यादें है गुम लम्हें जहाँ तेरी शैतानियाँ हैं लम्हें जहाँ मेरी मनमानियाँ हैं लम्हें जहाँ तेरी नाराज़गी थी लम्हें जहाँ प्यार था दोस्ती थी तस्वीर में […]

अल्फ़ाज़ मेरे होंगे….

1. अक्षर अक्षर लिखा तुमको, मैंने एक डायरी में। मैं अक्सर जो कहता तुमसे, कविता और शायरी में। बिना सुरों का बिना ताल का, मैं इक गीत बेचारा था। होठों की सरगम से छूकर, तुमने जिसे सँवारा था। तुमसे मिलकर गीत लिखे कुछ, बस यही सोचकर मैंने……….. शायद मेरे इन गीतों में, कुछ साज तेरे […]

जंग क्यों?

  जंग क्यों? …………………………………… पूरब हो या पश्चिम का कोई कोना जंग में कुछ नहीं पाना सिर्फ खोना क्या फर्क पड़ता है जीत हो या हार हो दोनों तरफ बस वही लाशों पर रोना जीत के जश्न के बाद इन्हें दफन कर देना बारूद से पैसे बचें तो कफ़न कर देना आतंकवादी हो, दुश्मन या […]